वाराणसी :- कल से पहला रोज़ा रखेंगे रोज़ेदार, जानिए क्या होता है रोज़ा और क्या है इसका मक़सद
मोहम्मद रिजवान
वाराणसी। पवित्र माह रमज़ान का चांद दिखते ही मुस्लिम बंधू रोज़ा रखने की तैयारियों में लग गए हैं। कल रमज़ान की पहली तारीख है। आज रात से मस्जिदों में तरावीह की नमाज़ शुरू हो जाएगी। इस्लाम में सबसे पवित्र माह माने जाने वाले रमज़ान का क्या मकसद है और इसमें रखा जाने वाला रोज़ा क्या है जानिये इस खास रिपोर्ट में...
रमज़ान एक ऐसा बा-बरकत महीना है जिसका इंतज़ार मुस्लिम बंधू साल भर करते हैं। इस्लाम के अनुसार इस महीने के एक दिन आम दिनों के हज़ार दिनों से भी बेहतर होता है। मुस्लिम समुदाय में जो औरत या मर्द बालिग़ हो चुका है उसके ऊपर रमज़ान के रोज़े वाजिब (अनिवार्य) हैं। यह महीना अल्लाह का महीना माना जाता है और साल भर की इबादतों से ज़्यादा इस माह में इबादत करने का सवाब (पुण्य) माना गया है।
रोज़ेदार फज्र की अज़ान के पहले सहर करके रोज़ा रखते हैं। दिन भर रोज़ादारों को कुछ भी खाने या पीने की मनाही होती है। शाम में मगरिब की अज़ान के बाद रोज़ा खोला जाता है। इस वक़्त अफ्तार का इंतेज़ाम किया जाता है।
क्या हैं रोज़े के मायने
रोज़े के मायने सिर्फ यही नहीं है कि, इसमें सुबह से शाम तक भूखे-प्यासे रहना होता है। बल्कि रोज़ा वो अमल है, जो रोज़दार को पूरी तरह से पाकीज़गी का रास्ता दिखाता है। रोज़ा वो अमल है जो इंसान को बुराइयों के रास्ते से हटाकर अच्छाई का रास्ता दिखाता है। महीने भर के रोजों को जरिए अल्लाह चाहता है कि, इंसान अपनी रोज़ाना की जिंदगी को रमज़ान के दिनों के मुताबिक़ गुज़ारने वाला बन जाए, यानि संतुलित ।
शरीर के हर आज़ा का है रोज़ा
रोज़ा सिर्फ ना खाने या ना पीने का ही नहीं होता, बल्कि रोज़ा शरीर के हर आज़ा (अंग) का होता है। इसमें इंसान के दिमाग़ का भी रोज़ा होता है, ताकि, इंसान के खयाल रहे कि, उसका रोज़ा है, तो उसे कुछ गलत बातें नहीं सोचनी हैं । उसकी आंखों का भी रोज़ा है ताकि उसे ये याद रहे कि उसका रोज़े में उसकी आखों से भी कोई गुनाह ना हो। उसके मूंह का भी रोज़ा है ताकि वो किसी से भी कोई बुरे अल्फ़ाज ना कहे और अगर कोई उससे किसी तरह के बुरे अल्फ़ाज कहे तो वो उसे भी इसलिए माफ कर दे कि उसका रोज़ा है।
रोज़े का मकसद इंसान बुराइयों से रहे साल भर दूर
उसके हाथों और पैरों का भी रोज़ा है ताकि उनसे कोई ग़लत काम ना हों। इस तरह इंसान के पूरे शरीर का रोज़ा होता है, जिसका मक़सद ये भी है कि, इंसान बुराई से जुड़ा कोई भी काम ये सोचकर ना करे कि, वो रोज़े में है और यही अल्लाह अपने बंदे से चाहता है।

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