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अलविदा अलविदा माहे रमजान अलविदा.....

 अलविदा अलविदा माहे रमजान अलविदा.....




...तेरे आने से दिल खुश हुआ था

वाराणसी (मोहम्मद रिज़वान)


 कल्बे आशिक है अब पारा पारा,


अलविदा अलविदा माहे रमजान।


तेरे आने से दिल खुश हुआ था,


और ज़ोके इबादत बडा था,


आह,अब दिल पे है गम का गलबा,


अलविदा अलविदा माहे रमजान।


नेकिया कुछ न हम कर सके हे,


अह इस्सियाहे में दिन कटे है,


हाय गफलत में तुझको गुज़ारा,


अलविदा अलविदा माहे रमजान।


कोई हुस्न अमल न कर सका हूँ,


चाँद आसू नज़र कर रहा हूँ


यही है मेरा कुल असासा,


अलविदा अलविदा माहे रमजान।


जब गुज़र जायेंगे माह ग्यारा,


तेरी आमद का फिर शोर होगा,


है कहा ज़िन्दगी का भरोसा,


अलविदा अलविदा माहे रमजान।


बज्मे इफ्तार सजती थी कैसी,


खूब सहेरी कि रोनक भी होती,


सब समां हो गया सुना सुना,


अलविदा अलविदा माहे रमज़ा।


याद रमजान की तड़पा रही है


आंसू की जरहे लग गयी है,


कह रहा है हर एक कतरा,


अलविदा अलविदा माहे रमज़ा।


तेरे दीवाने सब के सब रो रहे है,


मुज़्तरिब सब के सब रो रहे है,


कौन देगा इन्हें अब दिलासा,


अलविदा अलविदा माहे रमज़ा।


में बदकार हूँ मैं हूँ काहिल,


रह गया हूँ इबादत में गाफिल,


मुझसे खुश होके होना रवाना,


हमसे खुश होके होना रवाना,


अलविदा अलविदा माहे रमज़ा।


वास्ता तुझको प्यारे नबी (स.अ.व.) का,


हशर में मुझे मत भूल जाना,


हशर में हमें मत भूल जाना,


रोज़े महशर मुझे बकशवाना,


रोज़े महशर हमें बकशवाना,


अलविदा अलविदा माहे रमज़ा।


तुमपे लाखो सलाम माहे रमज़ा।


तुमपे लाखो सलाम माहे गुफरान।


जाओ हाफिज खुदा अब तुम्हारा,


अलविदा अलविदा माहे रमज़ा।


अलविदा अलविदा माहे रमज़ा।


अलविदा अलविदा माहे रमज़ा....।

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