...इस्लाम जिंदा होता है हर कर्बला के बाद
सरफराज अहमद
वाराणसी। कत्ले हुसैन असल में मरगे यजीद है, इस्लाम जिंदा होता है हर कर्बला के बाद...। मौलाना मोहम्मद अली जौहर का लिखा यह कलाम कर्बला के शहीदों को खिराज़े अक़ीदत पेश करने में पूरी तरह कामयाब है। कर्बला की कहानी उस शख्सियत की, जिसके लिए मुसलमान मानते हैं कि उन्होंने अपना सिर कटाकर इस्लाम को बचा लिया। कहा जाता है कि इन्होंने दीन-ए-इस्लाम को बचाने के लिए एक से बढ़कर एक कुबार्नी दी। इनमें उनके छह माह के बेटे की शहादत •ाी शामिल हैं और 18 साल के बेटे की •ाी। जी हां कर्बला के शहीदे आज़म इमाम हुसैन (रजि.) की हम बात कर रहे हैं। ये वही हुसैन हैं, जिनके लिए प्यारे नबी हज़रत मोहम्मद (स.) ने कहा था कि हुसैन मुझसे है और मैं हुसैन से। इसके बाद •ाी उस वक्त का ज़ालिम बादशाह यजीद ने उनको अपने सामने झुकाना चाहा, मगर इमाम हुसैन ने अपना सिर तो कटा दिया मगर यज़ीद के सामने झुके नहीं। उन्होंने दुनिया को उस इस्लाम की परि•ााषा समझाया जो उनके नाना हज़रत मोहम्मद (स.) ने तैयार की थी, उन्होंने काफी पहले ही दुनिया को बता दिया था कि दीन को बचाने के लिए कर्बला में जंग होगी और उनके नवासे इमाम हुसैन अपने कुनबे के साथ शहीद होंगे। नाना के दीन को बचाने के लिए इमाम हुसैन ने अपना सब कुछ निछावर कर दिया और दुनिया को ये पैग़ाम दिया कि हक़ और हुकुक के लिए झुकने से बेहतर है अपना सब कुछ खुदा की राह में कुर्बान कर देना। लोगों ने सोचा कि इमाम हुसैन की शहादत के बाद दुनिया से इस्लाम खत्म हो जायेगा मगर कर्बला के बाद इस्लाम पूरी दुनिया में छा गया। आज 10 वीं मोहर्रम यानी कर्बला के शहीदों की शहादत का दिन है। इस दिन उनका जिक्र करना और जिक्र सुन्ना •ाी सवाब है।
कौन हैं इमाम हुसैन
इमाम हुसैन का जन्म इस्लामिक कैलेंडर के मुताबिक 3 शाबान, सन 4 हिजरी (यानी 8 जनवरी सन 626) को सऊदी अरब के शहर मदीना में हुआ। उनके वालिद का नाम हज़रत अली और वालिदा का नाम जनाबे फातेमा था। शाबान इस्लामी कैलेंडर यानी हिजरी में आठवां महीना होता है जो रमजान के महीने से पहले आता है। मुसलमान इसी तारीख के मुताबिक उनकी यौमे पैदाइश मनाते हैं।
इराक के कर्बला में है इमाम हुसैन का रौज़ा
किताबों में मिलता है कि 4 मई 680 ई. में इमाम हुसैन ने अपना घर मदीना छोड़ दिया मक्का जाने के लिए. वहां वो हज करना चाहते थे। तब उन्हें पता चला कि दुश्मन हाजियों के •ोष में उनको कत्ल कर सकते हैं। हुसैन नहीं चाहते थे कि काबा जैसी पवित्र जगह पर खून बहे। वो वहां से चले गए. दूसरी वजह ये •ाी थी कि दुश्मन उनको चुपके से कत्ल करने का इरादा किये हुए था कि किसी को पता न चले। मुस्लिम इतिहासकारों के मुताबिक हुसैन चाहते थे कि अगर उनको कत्ल किया जाए तो जमाना देखे और खुद तय करे कि कौन सही और कौन गलत। वो एक ऐसे जंगल में पहुंचे, जिसका नाम कर्बला था। कर्बला आज इराक का एक प्रमुख शहर है। जो इराक की राजधानी बगदाद से 120 किलोमीटर दूर है। कर्बला मुस्लिम के लिए मक्का और मदीना के बाद दूसरी सबसे प्रमुख जगह है. क्योंकि ये वो जगह है जहां इमाम हुसैन की कब्र है। दुनिया •ार से मुस्लिम वहां पहुंचते हैं।
जन्नत का चांद अर्श का तारा हुसैन है डुबा ना क•ाी जो वो सितारा हुसैन है
वो शहादत तो दिखिए ज़ेहरा के लाल की, हर कौम कह रही है हमारा हुसैन है।।




Comments
Post a Comment